Monday, 6 October, 2008

आज का राजनैतिक परिदृश्य

एक दो दिन पहले अखबार की सुर्खिया थी, मुस्कुराते हुए एक राजकुमार की तस्वीर, जिसने कंधे पर तसला उठा रखा था । किसी गाँव में कई मजदूरों के साथ कंधे से कन्धा मिलाते हुए राजकुमार को देखकर काफ़ी खुशी हुयी । ये राजकुमार कोई और नही राहुल गाँधी ही थे। मैंने अपने एक मित्र से इसकी चर्चा की तो उन्होंने एक पल भी नही लगाया ये कहने में की ये तो दिखावा हैं। चुनाव आने वाले हैं, इस्सलिये ढोंग हैं ये। मैं तो खैर ऐसी सोच नही रखता । आज का युवा नेता फ़िर भी ढेर सारे सठियाये हुए , नाकाम घुटने वालो से बहुत अच्छे हैं, और इस मामले में मैं बहुत ही optimistic हूँ की आने वाला वक्त में भारत इन युवा नेतृत्व के जोशीले और आधुनिक विचारो से सारी दुनिया से अपना लोहा मनवाएगा। भारतीय राजनीतिज्ञों ने अपनी जो छवि देश-वाशियो के सामने पेश कर रखी हैं उसकी वजह से उनके किए कराये पे भी पानी फ़िर जाता हैं । चाहे वो देश जनता के लिए कुछ भी कर ले , विचारधारा ही ऐसी हो गई हैं, की उनपे भरोषा करने का मन नही करता, और लगता हैं की उनकी नेक नियति में भी कही न कही उनका अपना कोई स्वार्थ छिपा हैं।

राहुल गाँधी चाहे दिखावा ही कर रहे हो, पर उससे जन जन तक एक संदेश गया हैं, एक एक युवा तक ये संदेश गया हैं की हमें फ़िर से ग्रास रूट लेवल तक उतरना होगा, भारत की आत्मा अभी भी गाँवों में बसती हैं, और गाँवों की स्थिति ले देकर वही की वही हैं जो आजादी के वक्त थी। बिजली, पानी और सड़के तो पहुची हैं गाँवों तक, स्कूल भी खुले हैं, स्वास्थ्य सेवाए भी पहुँची हैं। पर प्रयाप्त कुछ नही हैं। स्थिति में कोई बहुत बड़ा बदलाव नही हैं। गाँवों से पलायन जारी हैं, कृषको की आत्महत्या की प्रवृति बढ़ रही हैं, देश में अमीर और ज्यादा अमीर हो रहे हैं, और गरीबों की हालत बद से बदतर होती जा रही हैं।

विगत ६० वर्षो में भारत अनगिनत संघर्षो से लोहा ले चुका हैं और यह क्रम अभी भी जारी हैं। अनेक संघर्ष झेल रहा हैं और अनेक लडाई लड़नी हैं । पर राजनीती का जो विभत्श रूप आज हमारे सामने हैं , वो अभूतपूर्व हैं। तुष्टिकरण की राजनीती में कुछ नेता तो ऐसे रम गए हैं की उन्हें कुछ नही दीखता, दीखता हैं तो सिर्फ़ वोट बैंक। अब कल की ही बात लीजिये अमर सिंह को बटला हाउस की मुठभेड़ फर्जी नजर आती हैं। अमर सिंह, मुलायम जी, सावधान , जनता अंधी, गूंगी, बहरी नही हैं, वो सिर्फ़ अभी चुप हैं। शहीद का अपमान करना बहुत भारी पड़ेगा अमर सिंह को।

हाँ तो मैं ये कह रहा था की राजनीति कुछ स्वार्थ लोलुप लोगो की रखैल बन गई हैं। प्रत्येक नेता धन पड़ की लालसा में , उपभोग में व्यस्त हैं। देश समाज के विषय में उनकी सोच सिर्फ़ भाषणों में , पत्र-पत्रिका या टीवी चंनेलो में साक्षात्कार के वक्त जगती हैं, बाकी समय वो सुशुप्त रहती हैं।भारतीय जनता अपनी चाहत को सीने में दबाये एक योग्य विकल्प तलाश रही हैं। लेकिन साधारण नागरिक तो दूर, बुद्धिजीवी वर्ग भी एक इस विकल्प सृजन में असमर्थ हैं। कारण तो इसके कई गिनाये जा सकते हैं जैसे जनता का राजनीति में सक्रीय सहयोग न होना, राजनैतिक जागरूकता का अभाव, अर्थाभाव व् अज्ञानता..... जिसके कारण आम जनता दो जून की रोटी और कपड़े लत्तो व् दवा दारु की व्यवस्था तक ही सिमित हो चुका हैं। इसके निवारण के लिए एक भी उपाय ढूंढ़ना असंभव तो नही, पर टेढी खीर जरूर हैं।

राजनैतिक चरित्र पतन का आलम ये हैं की हम ६० वर्षीय लोकतान्त्रिक अनुभव के बाद भी जातिवाद, क्षेत्रवाद और परिवारवाद के सिकंजे में जकडे हुए हैं। चुनावो में राजनैतिक दल इसी आधार पर अपना प्रत्याशी खड़ा करते हैं, हमारे मतों के विभाजन का आधार जाती, धर्म और क्षेत्र पर निर्भर होता हैं। ग्रामीण क्षेत्रो का सैट प्रतिशत मत विभाजन इसी आधार पर होता हैं । क्या किसी राजनैतिक दल ने, सरकार ने इस मनोवृति को ख़तम करने के लिए कोई कदम उठाया हैं ? आम जनता को कभी भी राजनैतिक जागरूकता के लिए प्रोत्शाहित किया गया हो परिलक्षित नही होता। उल्टे सभी अपनी अपनी रोटियाँ सेकने में मशगुल हैं। चाहे वो कोई भी दल हो हर चुनाव में उनके द्वारा प्रोत्शाहित किया जाता हैं जातियातावाद, क्षेत्रवाद और धर्मान्धता को।

प्रत्येक दल का चुनावी घोषणापत्र (वैसे यह सिर्फ़ घोषणा पत्र ही हैं) बुनियादी विषयो की या तो अवहेलना करता हैं या फ़िर कागजी वायदा बनाकर ताक पर रख देता हैं। देश की आधारभूत समस्याए वही की वही रह जाती हैं ।
गरीबी हटाओ के चुनावी अभियान का क्या हुआ ? गरीब रथ ने कितने गरीबो का भला किया ? कितने गरीब उबारे गए ? पर यहाँ गरीब की फ़िक्र है किसे ? गरीब तिनके बटोरता रह जाता हैं अपने झोपडे को सवारने के लिए और वे " मन्दिर वहीँ बनायेगे" चिल्लाते नही थकते। ना मन्दिर ही बनता हैं ना झोपडा। बेशर्म हो गए हैं सारे नेता सारे दल। पिछले चुनाव में कारगिल युद्ध को ही चुनावी मुद्दा बना दिया । देश के दो सबसे बड़े दल कांग्रेस और भाजपा ने पिछले चुनाव में कारगिल युद्ध विषय पे जो तू तू मैं मैं की वोह बहुत ही गैर जिम्मेदाराना थी। दोनों दलों के शीर्ष नेतृत्व में क्या इतनी भी सोच नही की इस तरह की बयानबाजी से अंतर्राष्ट्रीय मंच तक ग़लत संदेश पहुचते हैं। और परमाणु करार के सन्दर्भ में कम्युनिस्टो का जो रवैया पिछले दिनों देखने को मिला वो उनकी संकीर्ण सोच को दर्शाता हैं। आज मार्क्स सामयिक नही हैं, जरूरत हैं आज सभी के साथ मिलकर कदम बढ़ाने की । और हम अमेरिका जैसी महाशक्ति का साथ लेना भारत के स्वर्णिम भविष्य के लिए जरूरी हैं।

एक और बात का अचरज होता हैं की मार्क्सवादी सत्ता लोलुप भी हो गए। मैं उनको विचारधारा से प्रेरित मानता था। पर पिछले दिनों सरकार गिराने और बचाने की जो कवायद हुयी उससे ये बिल्कुल साफ़ हो गया की राजनीति अब विचारो से नही बल्कि अरबो खरबों से निर्देशित होती हैं।

राजनैतिक अराजकता का इससे बड़ा उदहारण कोई नही की एक भी दल मूल विषयो पर , जन कल्याण के मुद्दों पर कुछ नही बोल रहा हैं। देश में व्याप्त गरीबी, अशिक्षा, जनसँख्या वृधि, भ्रष्टाचार , बेरोजगारी , राजनैतिक अस्थिरता, आतंकवाद और क्षेत्रवाद जैसी ज्वलंत समस्याओ के रहते क्या सोनिया गाँधी का विदेशी मूल, या मन्दिर मस्जिद को चुनावी मुद्दा बनाना चाहिए ?

आम जनता क्या चाहती हैं? " रोटी कपडा और मकान " चैन और सुकून से साथ। और ये छोटी सी बात पिछले ६० वर्षो में राजनीतिज्ञों की समझ से परे हैं। क्यूँ ? इसकी वजह ये हैं की कोई भी राजनैतिक दल या नेता जनता के प्रति समर्पित नही हैं। उनका देश और समाज के प्रति कर्तव्य बोध कुर्सियो पर आसीन होते ही बहक जाता हैं और बन जाते हैं स्वार्थी शोषक। ये नेता इतना भी नही समझते की हर चुनाव में देश के करोडो रुपयों का हवन होता हैं और जनता के खून पसीने से सिंचित उनके रुपयों को अपने स्वार्थ वश बरबाद करना अक्षम्य अपराध हैं।