Friday, 31 October, 2008

असम,पर इस्लामी आतंकवाद का हमला

असम, सारा उत्तर पूर्वी भारत हमेशा आतंकवाद का दंश झेलता रहा हैं। पृथकतावादी ताकते इन प्रदेशो में पिछले ४ दशको से काबिज हैं। एन एस सी एन , मिजो नेशनल लिबरेशन फ्रंट , उल्फा, बोडो और दूसरे छोटे छोटे उग्रपंथी दल पिछले सालो में हमेशा आतंकी कारनामे अंजाम देते रहे हैं। पर ३०/१०/२००८ का सीरियल बोम्ब ब्लास्ट पिछले सारे आतंकी गतिविधियो से पृथक हैं। इसबार असम पर इस्लामी आतंकवाद का हमला हुआ हैं जो की गंभीर चिंता का विषय हैं।

उत्तर पूर्वी राज्यों में अवैध्य विदेशियो विशेषकर बंगलादेशी मुशलमानो की संख्या बढती जा रही हैं। अनाधिकार सीमा पार से अनुप्रवेश जारी हैं। कुकुरमुत्तो की तरह मस्जिद और मदर्शे उग रहे हैं। रिमोट इलाको में, गहरे घने जंगलो में बसे गावो में जहाँ मुसलमानों की जनसँख्या ५-१० घर परिवार ही हो, वहां शानदार पक्की बड़ी मस्जिद स्थापित होना इस्लामी मुल्को और जेहादी संगठनो के पैसो का इन्वोल्वेमेंट दर्शाता हैं। बांग्लादेश को आई एस आई भारत के ख़िलाफ़ इस्तेमाल कर रही हैं। उन्ही की सहायता से आतंकवाद की खेती की जा रही हैं असम में, सारे भारत में।

स्थानीय नेताओं का प्रश्रय , जेहादी मानसिकता, अल्पसंख्यक वर्ग में बढती असुरक्षा की भावना, शिक्षित युवाओं में बेरोजगारी, निर्धनता आतंकवाद को स्थापित कर रही हैं ।

अब तो बस प्रतीक्षा हैं, परिवर्तन की । प्रतीक्षा हैं कलयुग के अवतार की।
" यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत:, अभ्युथानम् च धर्मश्ये, संभवामि युगे युगे: ॥

Saturday, 25 October, 2008

आन्च्लिक्तावाद , भारतीय संघीय प्रणाली को चुनौती

महाराष्ट्र में जो हुआ, जो हो रहा हैं, उसका प्रतिउत्तर जो पटना में गूँज रहा हैं वो कत्तई किसी भी राष्ट्र के लिए एक चुनौती हैं। अपने ही देश वासियो पे लाठी चलाना, बन्दूक तान ना किसी भी राष्ट्र के सैनी, सुरक्षा बल के लिए कठिन होता होगा, ये मेरा मानना हैं। मुंबई में ऐसा नही की पुलिस बल नही था, या फ़िर उनका उद्देश्य दंगा रोकना नही था, पर जब अपने ही लोगो पर, अपने भाइयो पर लाठी भांजनी हो तो हाथ कापने लगते हैं। २८.10.२००८ लेकिन महाराष्ट्र पुलिस के haath नही कांपे राहुल raj को किसी खतरनाक आतंकवादी ki तरह एनकाउंटर me ढेर करते। क्या हो रहा हैं देश में ? एक अकेला नौजवान बस में चढ़ता हैं और बस को एक तंमचे से हाइजैक करने की कोशिश करता हैं ? (प्रश्न चिन्ह) । मुंबई पुलिस जिसे आतंकवादियो और दावूद गैंग, ड्रग माफिया और स्थानीय भाइयो से लोहा लेने का अपार अनुभव हैं, क्या राहुल राज को गिरफ्तार नही किया जा सकता था ? क्या उसकी मांगो के मुताबिक पुलिस कमिश्नर से उस्सकी बात नही करायी जा सकती थी। आनन् फानन में राहुल राज का कत्ल बिहारियों और उत्तर भारतीयों की आवाज दबाने की कोशिश हैं।

सोचने की बात ये हैं की पढ़े लिखे छात्र, बुद्धिजीवी, भी बिहारी मराठी जैसे आन्च्लिक्तावादी सोच रखते हैं, और ऐसी विचारधारा बढती जा रही हैं। दिल्ली की मुख्यमंत्री माननीया शीला दीक्षित भी एक बार अपनी ऐसी ही सोच जाहिर
कर चुकी हैं। भारत एक संघीय प्रणाली से गठित हैं, राज्य अलग अलग हैं पर राष्ट्र एक, यहाँ सभी भारतीय नागरीक हैं। चाहे वो किसी भी राज्य से हो , सबको समान अधिकार प्राप्त हैं। मेरा मानना ये हैं की, किसी भी भारतीय को इससे कोई ऐतराज भी नही हैं जब तक कोई राजनैतिक उकसावा ना हो। लेकिन राजनीती बड़ी कुत्ती चीज हैं, इसे और कुछ नजर नही आता सिवा वोट बैंक के।

Wednesday, 15 October, 2008

मोली की कहानी

मोली, कितना प्यारा नाम हैं ना ? नन्ही ३ साल की हैं अभी। नाम जैसा प्यारा हैं उतनी ही प्यारी गुडिया सी हैं मोली।
अपने खेल खिलौने से बहुत प्यार हैं उसे। उसका एक सॉफ्ट टेड्डी हैं, जिसे वो बाबु बुलाती हैं, वो बाबु से लिपटकर सोती थी। उसे एक पल भी आंखों से बाबु दूर होता तो वो बेचैन हो जाती थी। रो रोकर बुरा हाल हो जाता था। पर उसके
मम्मी पापा गंदे हैं, मैं नही मोली कहती हैं। मम्मी पापा आपस में लड़ते रहते हैं। उनकी लड़ाई के चक्कर में मोली का बाबु दिल्ली में छूट गया, और पापा भी दिल्ली में रह गए। और मम्मी आ गई अपने मम्मी पापा के पास। पर मोली क्या करे, बाबु से दूर, पापा से दूर?

चाचू की शादी में मोलू दादी के घर आई। पहली बार। हाँ जन्म के तुंरत बाद से hi वो दादी के घर से माँ के घर, माँ के घर से नानी के घर, नानी के घर से अपने पापा के दिल्ली वाले घर, फ़िर मामा के घर, और अब फ़िर माँ के घर... घूम ही रही हैं। लेकिन मोलू से किसी ने नही पूछा की " मोलू कहाँ जाना हैं?" कहाँ रहना हैं ? हाँ मोलू पहली बार दादी के घर आई, जैसे रौनक आ गई हो घर में। नई चाची की उतनी पूछ नही थी, जितनी मोली की थी। पापा भी आए , दादी-दादा, चाची-चाचा, बुआ, और पापा-मम्मी सभी मोली को कितना प्यार करते हैं। मोली बहुत खुश हैं यहाँ सबके साथ, बस एक गम हैं बाबु नही आया उसके चाचू की शादी में। फ़िर भी मोली इतने में भी बहुत खुश थी। सबका साथ जो था। पर फ़िर मम्मी ले गई उसे नानी के घर। मोली समझ कहाँ पाती थी की मम्मी पापा लड़ते क्यूँ हैं, वो छोटी सी जान कैसे समझती जब वो दोनों ही नही समझ पा रहे थे। और हम ही कहाँ समझ गए? बहुत दिमाग पर जोर डालते तो इतना समझ आता की दोनों के विचार नही मिलते, आपस में समझ नही हैं, टेम्परामेंट नही मिल रहे। लेकिन इन सबमे मोली की क्या गलती ? "मोली की कहानी " काफ़ी लम्बी होती जा रही हैं, इसलिए मैंने इसके लिए दूसरा ब्लॉग आरम्भ कर दिया हैं मोलिकिकहानी.ब्लागस्पाट.कॉम

Tuesday, 14 October, 2008

महिला सशक्तिकरण

आज हमारी महिला मुख्यमंत्री श्रीमती शीला दीक्षित का उद्योक्ताओ के नाम एक अपील पढ़ी। उनका अनुरोध था की एम्प्लोयेर्स महिला और अन्य कमजोर वर्ग को रात के समय काम न दे। शाम ७.०० बजे से सुबह ७.०० बजे की पाली में अगर किसी महिला या कमजोर वेर्ग को नियुक्त करना हैं तो सरकार से अनुमति ले।

दिल्ली सरकार का महिला सशक्तिकरण का नारा , वाह शीला जी, मैं आपकी बहुत कद्र करता हूँ, और आपके सफल नेतृत्व की सराहना करता हूँ, पर सौम्या के केश में आपका रवैया बहुत ही गैरजिम्मेदाराना हैं। मैं आपके इस appeal को सौम्या मामले से जोड़ कर देखता हूँ। क्या वो अगर महिला नही होती तो सुरक्षित होती ? मैडम, सिम कार्ड रिचार्ज के लिए दिल्ली में केरोसिन डालकर आग जिसको लगायी गई वो महिला नही पुरूष था। और आर के शर्मा ने शिवानी की हत्या उसके घर में करायी थी, सड़क पे नही। दिल्लीवासियो की सुरक्षा की जिम्मेदारी आपकी हैं, दिल्ली पुलिस की हैं, आप सब अपनी जिम्मेदारियो से पल्ला झाड़ने की कोशिश कर रहे हैं।

Wednesday, 8 October, 2008

सिंगुर, पश्चिम बंगाल के लिए एक सबक

पश्चिम बंगाल , ब्रिटिश काल में भारत की आर्थिक राजधानी, औद्योगिक केन्द्र, एक समय भारतीय उद्योगपतियो का पसंदीदा स्थान जहाँ वो अपने उद्योग स्थापित करना चाहते थे। वामपंथी नीति और वहां की कामगार यूनियन की यदा कदा मांगे और हड़ताल ने बहुत नुक्सान पहुचाया वहां स्थापित उद्योग धंधो को, और उद्योगपति धीरे धीरे मुख मोड़ने लगे पश्चिम बंगाल से।

टाटा ki महत्वकांक्षी लखटकिया nano कार परियोजना का सिंगुर से सानंद, गुजरात जाना पश्चिम बंगाल के लिए शुभ संकेत नही हैं। ममता बनर्जी के हठधर्मिता ने पश्चिम बंगाल के असंतुष्ट उद्योगपतियों को एक नया रास्ता दिखाया हैं। सिंगुर अपने विकाश के सुनहरे अवसर से हाथ धो बैठा हैं ममता जी की कृपा से। सिंगुर में पश्चिम बंगाल का कोई भला नही हुआ हैं, सिंगुर की जनता को बहकाया गया हैं. एक बात कहूं ममता जी, सिंगुर की जनता आपको कोशेगी भविष्य में। और आज भी आपकी स्थिति कोई अच्छी नही हैं, आप जनमत करवाले सिंगुर में (निष्पक्ष) , मैं कहता हूँ आप कम से कम कुछ दिन मुहँ छिपाए रखेगी, वैसे राजनेताओ की आंखों में बहुत शर्म तो होती नही, थोड़े दिन बाद आप फ़िर वही वोट भीख मांगने निकल पड़ेगी।

कब तक देश की जनता को बरगलाया जायेगा, कब तक देश की जनता लुटती रहेगी ? इन नेताओ की, राजनैतिक महत्व्कंक्षाये सिर्फ़ वोटो की संख्या देखती हैं, और कुछ भी नही। सब कुछ गौण हैं सब कुछ नगण्य हैं वोट के सिवा।
बुद्धदेव ने टाटा को आमंत्रित किया , टाटा आई, जमीं का अधिग्रहण हुआ , ममता को मुद्दा मिला, उन्होंने अपनी राजनैतिक रोटिया सेकी, आमरण अनसन पर बैठी फ़िर जीवित ही उठ गई, सिंगुर में लाशें गिरी, बलात्कार हुआ, ममता को अफ्शोश हुआ, टाटा के कर्मियों के ऊपर आक्रमण होने लगा, ममता अपनी मांगो पर अडी रही, टाटा ने अपने कदम पीछे ले लिए, टाटा ने परियोजना स्थल गुजरात में स्थानांतर कर लिया।

अब ममता तुम बताओ , जिन घरो में लाशें तुमने गिराई हैं , जिन नारियो का तुम्हारी वजह से बलात्कार हुआ हैं, वो घर वाले तुम्हे कैसे माफ़ करेगे ? क्या उनके व्यक्ति जी जायेगे अब, या उस नारी की सामाजिक स्वीकृति आप सुनिश्चित करेगी ? इन सब के लिए जिम्मेदार तुम हो या फ़िर तुम्हारी वोटो की राजनीति । तुम्हारे ऊपर मुक़दमा चलना चाहिए।


Monday, 6 October, 2008

आज का राजनैतिक परिदृश्य

एक दो दिन पहले अखबार की सुर्खिया थी, मुस्कुराते हुए एक राजकुमार की तस्वीर, जिसने कंधे पर तसला उठा रखा था । किसी गाँव में कई मजदूरों के साथ कंधे से कन्धा मिलाते हुए राजकुमार को देखकर काफ़ी खुशी हुयी । ये राजकुमार कोई और नही राहुल गाँधी ही थे। मैंने अपने एक मित्र से इसकी चर्चा की तो उन्होंने एक पल भी नही लगाया ये कहने में की ये तो दिखावा हैं। चुनाव आने वाले हैं, इस्सलिये ढोंग हैं ये। मैं तो खैर ऐसी सोच नही रखता । आज का युवा नेता फ़िर भी ढेर सारे सठियाये हुए , नाकाम घुटने वालो से बहुत अच्छे हैं, और इस मामले में मैं बहुत ही optimistic हूँ की आने वाला वक्त में भारत इन युवा नेतृत्व के जोशीले और आधुनिक विचारो से सारी दुनिया से अपना लोहा मनवाएगा। भारतीय राजनीतिज्ञों ने अपनी जो छवि देश-वाशियो के सामने पेश कर रखी हैं उसकी वजह से उनके किए कराये पे भी पानी फ़िर जाता हैं । चाहे वो देश जनता के लिए कुछ भी कर ले , विचारधारा ही ऐसी हो गई हैं, की उनपे भरोषा करने का मन नही करता, और लगता हैं की उनकी नेक नियति में भी कही न कही उनका अपना कोई स्वार्थ छिपा हैं।

राहुल गाँधी चाहे दिखावा ही कर रहे हो, पर उससे जन जन तक एक संदेश गया हैं, एक एक युवा तक ये संदेश गया हैं की हमें फ़िर से ग्रास रूट लेवल तक उतरना होगा, भारत की आत्मा अभी भी गाँवों में बसती हैं, और गाँवों की स्थिति ले देकर वही की वही हैं जो आजादी के वक्त थी। बिजली, पानी और सड़के तो पहुची हैं गाँवों तक, स्कूल भी खुले हैं, स्वास्थ्य सेवाए भी पहुँची हैं। पर प्रयाप्त कुछ नही हैं। स्थिति में कोई बहुत बड़ा बदलाव नही हैं। गाँवों से पलायन जारी हैं, कृषको की आत्महत्या की प्रवृति बढ़ रही हैं, देश में अमीर और ज्यादा अमीर हो रहे हैं, और गरीबों की हालत बद से बदतर होती जा रही हैं।

विगत ६० वर्षो में भारत अनगिनत संघर्षो से लोहा ले चुका हैं और यह क्रम अभी भी जारी हैं। अनेक संघर्ष झेल रहा हैं और अनेक लडाई लड़नी हैं । पर राजनीती का जो विभत्श रूप आज हमारे सामने हैं , वो अभूतपूर्व हैं। तुष्टिकरण की राजनीती में कुछ नेता तो ऐसे रम गए हैं की उन्हें कुछ नही दीखता, दीखता हैं तो सिर्फ़ वोट बैंक। अब कल की ही बात लीजिये अमर सिंह को बटला हाउस की मुठभेड़ फर्जी नजर आती हैं। अमर सिंह, मुलायम जी, सावधान , जनता अंधी, गूंगी, बहरी नही हैं, वो सिर्फ़ अभी चुप हैं। शहीद का अपमान करना बहुत भारी पड़ेगा अमर सिंह को।

हाँ तो मैं ये कह रहा था की राजनीति कुछ स्वार्थ लोलुप लोगो की रखैल बन गई हैं। प्रत्येक नेता धन पड़ की लालसा में , उपभोग में व्यस्त हैं। देश समाज के विषय में उनकी सोच सिर्फ़ भाषणों में , पत्र-पत्रिका या टीवी चंनेलो में साक्षात्कार के वक्त जगती हैं, बाकी समय वो सुशुप्त रहती हैं।भारतीय जनता अपनी चाहत को सीने में दबाये एक योग्य विकल्प तलाश रही हैं। लेकिन साधारण नागरिक तो दूर, बुद्धिजीवी वर्ग भी एक इस विकल्प सृजन में असमर्थ हैं। कारण तो इसके कई गिनाये जा सकते हैं जैसे जनता का राजनीति में सक्रीय सहयोग न होना, राजनैतिक जागरूकता का अभाव, अर्थाभाव व् अज्ञानता..... जिसके कारण आम जनता दो जून की रोटी और कपड़े लत्तो व् दवा दारु की व्यवस्था तक ही सिमित हो चुका हैं। इसके निवारण के लिए एक भी उपाय ढूंढ़ना असंभव तो नही, पर टेढी खीर जरूर हैं।

राजनैतिक चरित्र पतन का आलम ये हैं की हम ६० वर्षीय लोकतान्त्रिक अनुभव के बाद भी जातिवाद, क्षेत्रवाद और परिवारवाद के सिकंजे में जकडे हुए हैं। चुनावो में राजनैतिक दल इसी आधार पर अपना प्रत्याशी खड़ा करते हैं, हमारे मतों के विभाजन का आधार जाती, धर्म और क्षेत्र पर निर्भर होता हैं। ग्रामीण क्षेत्रो का सैट प्रतिशत मत विभाजन इसी आधार पर होता हैं । क्या किसी राजनैतिक दल ने, सरकार ने इस मनोवृति को ख़तम करने के लिए कोई कदम उठाया हैं ? आम जनता को कभी भी राजनैतिक जागरूकता के लिए प्रोत्शाहित किया गया हो परिलक्षित नही होता। उल्टे सभी अपनी अपनी रोटियाँ सेकने में मशगुल हैं। चाहे वो कोई भी दल हो हर चुनाव में उनके द्वारा प्रोत्शाहित किया जाता हैं जातियातावाद, क्षेत्रवाद और धर्मान्धता को।

प्रत्येक दल का चुनावी घोषणापत्र (वैसे यह सिर्फ़ घोषणा पत्र ही हैं) बुनियादी विषयो की या तो अवहेलना करता हैं या फ़िर कागजी वायदा बनाकर ताक पर रख देता हैं। देश की आधारभूत समस्याए वही की वही रह जाती हैं ।
गरीबी हटाओ के चुनावी अभियान का क्या हुआ ? गरीब रथ ने कितने गरीबो का भला किया ? कितने गरीब उबारे गए ? पर यहाँ गरीब की फ़िक्र है किसे ? गरीब तिनके बटोरता रह जाता हैं अपने झोपडे को सवारने के लिए और वे " मन्दिर वहीँ बनायेगे" चिल्लाते नही थकते। ना मन्दिर ही बनता हैं ना झोपडा। बेशर्म हो गए हैं सारे नेता सारे दल। पिछले चुनाव में कारगिल युद्ध को ही चुनावी मुद्दा बना दिया । देश के दो सबसे बड़े दल कांग्रेस और भाजपा ने पिछले चुनाव में कारगिल युद्ध विषय पे जो तू तू मैं मैं की वोह बहुत ही गैर जिम्मेदाराना थी। दोनों दलों के शीर्ष नेतृत्व में क्या इतनी भी सोच नही की इस तरह की बयानबाजी से अंतर्राष्ट्रीय मंच तक ग़लत संदेश पहुचते हैं। और परमाणु करार के सन्दर्भ में कम्युनिस्टो का जो रवैया पिछले दिनों देखने को मिला वो उनकी संकीर्ण सोच को दर्शाता हैं। आज मार्क्स सामयिक नही हैं, जरूरत हैं आज सभी के साथ मिलकर कदम बढ़ाने की । और हम अमेरिका जैसी महाशक्ति का साथ लेना भारत के स्वर्णिम भविष्य के लिए जरूरी हैं।

एक और बात का अचरज होता हैं की मार्क्सवादी सत्ता लोलुप भी हो गए। मैं उनको विचारधारा से प्रेरित मानता था। पर पिछले दिनों सरकार गिराने और बचाने की जो कवायद हुयी उससे ये बिल्कुल साफ़ हो गया की राजनीति अब विचारो से नही बल्कि अरबो खरबों से निर्देशित होती हैं।

राजनैतिक अराजकता का इससे बड़ा उदहारण कोई नही की एक भी दल मूल विषयो पर , जन कल्याण के मुद्दों पर कुछ नही बोल रहा हैं। देश में व्याप्त गरीबी, अशिक्षा, जनसँख्या वृधि, भ्रष्टाचार , बेरोजगारी , राजनैतिक अस्थिरता, आतंकवाद और क्षेत्रवाद जैसी ज्वलंत समस्याओ के रहते क्या सोनिया गाँधी का विदेशी मूल, या मन्दिर मस्जिद को चुनावी मुद्दा बनाना चाहिए ?

आम जनता क्या चाहती हैं? " रोटी कपडा और मकान " चैन और सुकून से साथ। और ये छोटी सी बात पिछले ६० वर्षो में राजनीतिज्ञों की समझ से परे हैं। क्यूँ ? इसकी वजह ये हैं की कोई भी राजनैतिक दल या नेता जनता के प्रति समर्पित नही हैं। उनका देश और समाज के प्रति कर्तव्य बोध कुर्सियो पर आसीन होते ही बहक जाता हैं और बन जाते हैं स्वार्थी शोषक। ये नेता इतना भी नही समझते की हर चुनाव में देश के करोडो रुपयों का हवन होता हैं और जनता के खून पसीने से सिंचित उनके रुपयों को अपने स्वार्थ वश बरबाद करना अक्षम्य अपराध हैं।

Wednesday, 1 October, 2008

कहाँ गया तुम्हारा शान्ति राज राम राज ?


हे गांधीजी,
शान्ति राज्य राम राज्य का स्वप्न तुम्हारा
नही हुआ साकार
किसी ने ना सुनी "हे राम" की पुकार
हिंसा से भरा हैं देश
हैं घोर अंधकार
आकाश भी कंपकपाते हैं
सुनकर, यहाँ की दुर्नीति और अनाचार
हीनता और दीनता के शोर हैं यहाँ
चाकू रेवोल्वर के जोर हैं यहाँ
कोई नही सुनता हैं किसी की बात
दिन कब गुजरता हैं, कब हो जाती हैं रात
नेता सिर्फ़ गिनते हैं यहाँ वोट
भरते हैं पाकेटों में हरे हरे नोट
कानून के रखवाले ही
सताते गरीबो को
पहन कर काले - काले कोट

जो आपके नाम का प्रयोग
भाषणों में करते हैं
वे ही कहाँ आपके आदर्शो पे चलते हैं
हिंशात्म्क तत्व न किसी से डरते हैं
सत्यवादी अहिन्षक भूखे मरते हैं

फिरते हैं शिक्षित यहाँ, काम के मारे
यहाँ जीते झूठ और सत्य हारे
अफसर हैं यहाँ रिश्वतखोर सारे
इनको देख हमारा दिल हाय हाय पुकारे
इसलिए महात्मा जी
अब तुम्ही दो जवाब
कहाँ गया तुम्हारा
वो शान्ति राज राम राज ??

ये फफोले

तुम्हे अहसास तो हुआ होगा
नपुंसकता का
जब तुम्हारी आँखे बरसी होगी
क्षत विक्षत लिंग कटे शहीद को देखकर
जब कांपते हांथो से
तुमने छुई होगी
वो ठंडी देह
बर्बरता का अवशेष ।

तुमने धिक्कारा होगा
अपने आप को
जब तुम्हारा ह्रदय जल रहा था
अमिट पीड़ा दे रहे थे
वो फफोले
नमक मिर्च भरे घाव
देखा तुम्हारी
तुच्छ राजनीति का परिणाम
तुष्टिकरण की नीतियों का अवशेष
तब तुम्हे याद आए होगे
वो असमिया छात्र
जो चेता रहे थे
ये आग
चिल्ला रहे थे "विदेशी भागो"
ओट रहे थे गोलिया छाती पर

और मैं ?
मैं तो पुरुषत्व विहीन हूँ
जो सोचता रहता हूँ
ऐसे वक्त में भी तुम्हारा अहसास..

तुष्टिकरण का परिणाम

भारत में जो हो रहा हैं, इंडियन मुजाहिद्दीन, हुजी, इत्यादि जो पनप रहे हैं इनके पीछे भारतीय राजनीतिज्ञों का बहुत बड़ा हाथ हैं। छुट भैये नेताओ से लेकर मोमिन भाइयो तक , सफ़दर नागौरी से लेकर आतिफ या किसी भी बड़े से बड़े आतंकवादी तक, कही न कही किसी न किसी राजनैतिक रसूख वाले का प्रश्रय हैं। एक बार फ़िर से युवा शक्ति को आगे आना होगा अगर देश को फ़िर से आजाद करना हैं इन देश बेचनेवालों से। मुझे तो ये समझ ही नही आया की जब असम का छात्र संघ मांग कर रहा था की देश से विदेशियो (विशेषकर बांग्लादेशियो ) को निकालो, वो कहाँ ग़लत थे ?
जब धारा ३७६ हटाने की बात आती हैं तो सारे राजनैतिक दल चुप क्यूँ हो जाते हैं? इनका खून क्यूँ नही खौलता जब संसद पर आक्रमण होता हैं, जब बांग्लादेश सीमा से १२ सैनिको की क्षत विक्षत लाशे आती हैं और जिनका अमानवीय तरीके से गुप्तांग कटे हुए होते हैं, इन राजनेताओ के पास तो स्वाभिमान हैं नही, इन्होने देश का स्वाभिमान भी गिरवी रख दिया हैं, वोट बैंक के सामने । अब एक ही रास्ता बचा हैं ये नपुंसक राजनेता नई पीढी के लिए रास्ता प्रशस्त करे, या फ़िर नई पीढी नेस्तनाबूद करे इन भ्रष्टाचारी और रीढ़ विहीन राजनेताओ को।

लड़कियों वक्त बदलना हैं

ये नया दौर हैं,
वक्त बदलना हैं,
एक नही दो कदम चलना है
रूप कँवर, आरुशी,
मधुस्मिता, अनारा गुप्ता
किस्मत की छली हैं ?
क्यूँ रोना हैं वक्त बदलना हैं।
एक नही दो कदम चलना हैं॥

कोई साथ नही, कोई सहारा कहाँ?
सूरज की रौशनी तो हैं मयस्सर
तुम्हे चलना हैं।

छोटी छोटी बातो से
लबलबाता सैलाब आँखों का
पलकों के पीछे एक बाँध करना हैं,
वक्त बदलना हैं,
एक नही दो कदम चलना हैं॥

शहरो में ललचाई लाल आँखों की भीड़ में,
इन कोपलों को खिलना हैं,
हॉस्टल की अधजली अधपकी रोटियां
याद आती हैं ना माँ की गूंथी चोटिया ?
रूकती चलती ट्रेन में
सफर तय करना हैं
वक्त बदलना हैं
एक नही दो कदम चलना हैं॥

नया दौर हैं देखो रुको नही
एक कदम ठहरना
दो कदम पिछड़ना हैं
एक नही दो कदम चलना हैं॥

एक माँ

यूँ पत्थरो पर खीचना लकीरे ,
आसान नही,
क्या तुम्हे दर्द का गुमान नही ?
उनके बीच पहुची हो ,
इंसान बनकर,
जिनका अपना कोई भगवान् नही।
एक माँ ही हैं इतना कर सकती
उसकी ममता से हम अनजान नही॥

(स्वर्गीय श्रीमती विजी श्रीनिवासन को समर्पित, जिन्होंने बिहार जैसी जगह में जनसेवा की)

Tuesday, 30 September, 2008

शब्द गूम जायेगे, रचना न होगा कविता

शब्द गूम जायेगे रचना ना होगा कविता
भाव थम जायेगे
मन क्षुब्ध होगा
गीत गुंजन
न मधुर कलरव होगा
ऐसा ही होगा
दूषित मन , कुलषित ह्रदय
कंकड़ पत्थरो की कठोर दुनिया में॥

खून खराबो से त्रस्त दुनिया में
रंग- राग, नाच - नृत्य कहाँ ?
विध्वंस का तांडव होगा॥

फूलो की खुसबू मर जायेगी
पौधे कसमसाये से
वायु दम घोटती,
मौसम बदलती दुनिया में
और तड़पता मन, अकेला
प्रेम - बंधुत्व विहीन
भीड़ भरी दुनिया में
प्रदूषित दुनिया में
शब्द गुम जायेगे रचना न होगा कविता॥

अमेरिका से सवाल

हो सकता हैं
तुम बहुत ऊंचे हो
तुमपर विजय ..... ?
तुम अपराजेय

पर तुम्हारी ओर
ऊंचे सर ताकना
या छाती तान चलना
क्या दुस्साहस हैं ?

आत्मभिमान
स्वाभिमान
राष्ट्राभिमान क्या तुच्छ हैं ?
तेरे अहम् , युद्धोन्माद के सामने।

Monday, 29 September, 2008

माँ

माँ
तेरे बेटे तेरे घर का चिराग
और मैं लक्ष्मी पराये घर की ?
वो कमजोर, बीमार, या भ्रष्ट
या वन्श्द्रोही
वो सहारा तुम्हारा
और मैं चंचला तुम पर बोझ ?

माँ
तुझे पता मैं नदिया, दरिया
तुम्हे पता मैं सागर तुम सी
रत्न कोख में मेरे पलेगे
सृष्टि मात्री प्यारी बनूँगी।

थोड़ा सा स्नेह हो निर्झर
सावन जैसी मेह बरसती
फ़िर देखो मेरी भी माँ
कन्या को माताये तरसती॥

भारत उदय - 3

एक सोच थी,
एक सपना था,
हर हाथ में मोबाइल हो (धीरुभाई का सपना)
की हर कान में गूंजे
एक मधुर घनघनाहट
(क्षमा करे फ़ोन की रिंग को घनघनाहट कहा जाता था)

काश उनकी आँखों में
कुछ ऐसे सपने आए होते,
हर पेट में रोटी
हर हाथ में कलम
और हर होंठ पे मुस्कराहट

भारत उदय -2

एक एक जन का घर नही
स्कुलो में नही छात
फुटपाथ पे सोये बच्चे
पेटों में नही भात
आती नही हैं लाज
करते हैं
भारत उदय की बात

भारत उदय - 1

चंद नन्हे कदमो की दूरी पर
एक आकाश
लाखो जगमगाते सितारे
और हजारो रोशन चाँद
सड़क किनारे फुटपाथ पर
और छोटे शहरों के छतविहीन
प्लेटफार्म पर
मीठी सर्दियो में
लेम्प्पोस्ट की रौशनी से
गर्माहट तापते
नींद का आश्वादन करते
अधखुली आँख से
देख रहे हैं वो भी
"भारत उदय"

अतीत यौवन और आज

जन्मदिवस की अथाह खुशी
और नववर्ष में समाने का वो क्षणिक उत्साह
घने कोहरे के आगोश में ठिठुरती कलम
सोचने लगी अतीत यौवन और आज

धुल धूसरित बालपन
माँ का स्नेह, पिता की फटकार,
मार दुलार
वो खेल खिलौने
वो छोटा सा बांस बल्लियो का घर
और उसके कोने कोने
बेसुध नींद , वो प्यारे बिछौने ।

ईंट पत्थरों की कठोर दीवारों में
कसमसाई,
डनलप के गद्दे, मंहगे पलंग,
छटपटाती
करवट बदलती नींद
महकते कमरे में याद आती
माटी की सौंधी महक।

बचपन कैशोर्य और यौवन के
क्षीण सीमारेखाओ को पहचानता
आधी नींद के बाद जगा
मैं और मेरी कलम
सोचने लगी, अतीत यौवन और आज।

किशोर मैं , अनियंत्रित झोंका
पालविहिन नौका,
उतकृष्ट मानस का अभावमय अंत
उद्दंड मैं सामान्य विद्यार्थी॥

यौवन से सामना
अनुराग, प्रेम, और
असीम कल्पना
चाह क्षितिज स्पर्श की
मंजिले अनेक थी
राह एक भी नही
पथ एक तलाशता
चाँद को था चाहता
यूँही रात ढल गई
जिंदगी बदल गई।

ओश बिखरी पत्तिया
चमक गई किरण उषा
पक्षियो का कुजन गूंजा
एक नई भोर थी।

एक नई भोर थी,
सारे राह मोडती,
पत्थरों की राह थी
रोटियों की दौड़ थी।

गाँव शहर छोड़कर
आ गया महानगर
वायु दम घोटती
हर पल भाग दौड़ थी,
फुरशत के पल कहाँ?
आधी रात में जगा
मैं और मेरी कलम

बचपन कैशोर्य और यौवन
क्षीण सीमारेखाओ को पहचानता
आधी नींद के बाद जगा
मैं और मेरी कलम
सोचने लगी,
अतीत यौवन और आज।

भारतीय रेल का सफर १९७५-२००५

आज फ़िर एक बार स्लीपर क्लास में बैठा अपने विचारो को लेखबद्ध करने का प्रयत्न कर रहा हूँ। आज तक मैंने जितना भी लिखा हैं या लिखने का प्रयास किया हैं अधिकांश मैंने इन्ही ट्रेनों की भरी भीड़ और छुक छुक , धडाक धडाक तथा पंखो के संगीत की पर्शध्व्नी ही लिखा है । इन ट्रेनों में मेरे विचारो और चिंतन का उत्कर्ष होता हैं। इसके कई कारण हो सकते हैं । सबसे बड़ा कारण सायद यह हो की शहरो की भागदौड़ से दूर ट्रेनों में घंटो का सफर कुछ वक्त देता हैं विचार चिंतन के लिए, आत्ममंथन के लिए। एक कारण यह भी हो सकता हैं की सारे भारत की, भारत की समृद्ध संस्कृति, भारतीय जन जीवन , सभ्यता का सम्मलेन होती हैं ट्रेने ।

विचारो की गहन तंद्रा में जब मैं डूबा रहता हूँ तो अचानक लस्सी लस्सी, चाय चाय, बाबु, अल्लाह के नम पर, राम के नाम पर जैसे शब्द, वाक्य विचलित भी करते हैं, विचारो को वाधित करते हैं। और कभी कभी तो सहयात्री का मदिरापान , धुम्रपान मन में क्रोध उत्पन्न करता हैं ।

जब युवा छात्र छात्राओ की तोलिया ट्रेन में हो तो बहुत आनंद आता हैं। मन उनके साथ किशोर हो जाता हैं, बहकने लगता हैं। तभी किसी नवयौवना या नवयुवक का अनुरोध भरा स्वर " अंकल आप यह बर्थ ले लो " सोचने को मजबूर कर देता हैं की तुम एक दशक पहले के प्रीवियस जेनरेशन से हो। फ़िर मैं अभिभावक बन जाता हूँ। उनको कोई कष्ट न हो, कोई परेशां न करे, कोई उठाईगीरा उनका कोई सामन न चोर ले , मैं ध्यान रखने लगता हूँ।
आजकल अच्छा अंकल बनने लगा हूँ मैं । कुछ वर्ष पहले झुंझलाता था , कह देता था मुझे अंकल नही भइया बोलो।

आजकल ट्रेन का सफर काफ़ी आरामदायक हो गया हैं। सबसे बड़ा सुधार जिसे मैं विप्लवकारी संज्ञा दूँगा वो हैं लगभग सभी गाडियो में पेंट्री कार का प्रचलन होना और लम्बी दुरी के आरक्षित कोचों में अनाधिकार सामान्य यात्रा के यात्रियो का प्रवेश लगभग बंद होना। पहले तो भोर होते ही अनाधिकार प्रवेश शुरू हो जाता और रात में ऐसे यात्री इन्ही आरक्षित डिब्बो के फर्श पर तानकर सो जाया करते थे। जिससे नींद कोशो दूर रहती थी लेकिन अब स्थिति में बदलाव हैं। अब भी कुछ ऐसा माहौल होली दिवाली, आदि उत्सव के मौको पर देखने को मिलता हैं। उत्सव के समय विशेषकर जो ट्रेने पूर्वांचल लांघती जाती हैं उनमे ये परिस्थितिया सामान्य हैं।

१९८० के आसपास मैं असम की लोकल ट्रेनों में लगभग ५० किलोमीटर का सफर किया करता था, दो घंटे का सफर, स्टीम चालित इंजन, खिड़की के पास बैठने का मोह, और आँखों में घुसता कोयला। काले हो जाते थे कपड़े। वे बर्थ काठ की होती थी जिस पर धुल धुएं की अच्छी खासी परत होती थी। मुझे याद हैं पहाडी पर चदते वक्त उन इंजनो का दम निकलने लगता था। ओश भरी और बारिश से भीगी पटरियों में पहिये फिसलने लगते, डिब्बो को खीच नही पाते, तो आगे और पीछे दो इंजन लगाये जाते। कभी कभी घुमावदार पटरियो पर रेत भी डाली जाती , फ्रिक्शन पैदा करने के लिए। आजकल स्टीम इंजन प्रचलन में नही हैं, पर उन इंजनो की आवाज और उसपर रची बाल कविताये - बालगीत आज भी कितने ही बच्चो के मन में उत्सुकता पैदा करती होगी। " छुक-छुक करती आई रेल " अब रेल छुक छुक नही धडाक धडाक करती हैं ।

उस समय के डिब्बो में टिमटिमाते २० वाट के बल्ब होते थे और काले छोटे पंखे। उनमे से अधिकतर पंखो को चलायमान करने के लिए कलम या पतली डंडी से मैनुअली घुमाना पड़ता था । ये नुस्खा आजकल भी कभी कभी प्रयोग में आता हैं।

आज रात की ही तो बात हैं , एक युवा छात्रा अपनी सहेली से कह रही थी, "यार मुझे ये समझ नही आता की इतना बड़ा आइना यहाँ क्यूँ लगाया गया हैं"। " मैं बार बार अनचाहे ही ख़ुद को आईने में निहार लेती हूँ"। मैं कहने ही वाला था की ये आइना तुम्हारे सौन्दर्य को निहारने के लिए ही हैं, तभी अंकल वाला रोल याद आ गया। ट्रेनों में अकेली लड़किया भी सफर करने लगी हैं, इसका मतलब ये नही की पुरूष वर्ग भद्र हुआ हैं, यह तो उनकी बढती आत्मनिर्भरता , बेबकिपन, शिक्षा और आत्मरक्षा की भावना का फल हैं। वरना पुरुषवर्ग (सहयात्री) में से आधे से अधीक जो की अकेले सफर कर रहे होते हैं, उनकी लोलुप आँखे टटोलती रहती हैं उनका यौवन। उम्र तक का लिहाज नही होता । ५०-६० वर्षीय वृद्ध भी कुछ ऐसे होते हैं जो लड़कियों से किसी न किसी बहाने सटने, उनको स्पर्श करने को लालायित होते हैं।

शौचालयों की अवस्था कुछ वर्ष पहले अत्यधिक गन्दी होती थी। फ्लश का प्रयोग काफ़ी लोग नही करते थे और पानी की कमी के कारन भी शौचालय गंदे रहते थे। और ऐसी ऐसी चित्रकारी उफ , गन्दी पोर्नोग्राफी भी उसके सामने कुछ भी नही। इसमे कुछ सुधर यु आया की शौचालयों की दीवारों पे लेमिनेट्स सनमाईका चिपकाये जाने लगे , जिसपर कलम से लिखना और कुरेदना कम हो गया। आजकल बोगियो को भी सप्ताह में कम से कम एक बार दिसिंफेक्टेड किया जाने लगा हैं। बोगियो की आंतरिक साज सज्जा में काफ़ी बदलाव आया हैं। बरथे aaramdayak बनने लगी हैं। बर्थ जिन लोहे की पत्तियो और मोटी जंजीरों से लटके होते हैं उनपर रबड़ और रेक्सीन चढाई जाने लगी हैं । पहले ऐसा नही होता था , ठण्ड में ये धातु काफी ठंडे हो जाया करते थे, जिससे स्पर्श होने पर ठण्ड का करंट सा लगता था। अब बर्थ चौडी और कम्पार्टमेंट स्पेसियस हो गया हैं । चूंकि अब अनारक्षित यात्री प्रवेश नही करते तो सहयात्रियो की आपसी समझ से दिन में भी बर्थ लगाकर सो सकते हैं। पहले लोग पीने के पानी की केतली, बोतल, मयूर जग लेकर चला करते थे, और बोतलों को भरने के लिए स्टेशन का इन्तेर्जार होता था। स्टेशन के नल पे लम्बी कतरे हुआ करती थी। वो महिलाये जिनके पति या बच्चे पानी भरने के लिए कतार में लगते उनकी जान सूखती रहती की कही ट्रेन चल न पड़े, ट्रेन छुट न जाए। कभी कभी पानी भरने गया सहयात्री दो बोगी पीछे ही ट्रेन में चढ़ पाता। तब तक बेचारी वो महिला आधी हो जाती थी। अब ऐसे लोग कम ही दीखते हैं । ज्यादातर लोग एक दो लीटर की पानी की बोतल ट्रेन में ही खरीदना पसंद करते हैं।

आजकल सभी बड़े स्टेशन में डिब्बो पे पानी चढाने की व्यवस्था हैं। उससे शौचालय गंदे नही होते और यात्री भी आजकल ट्रेवल मिन्देद हो गए हैं। वो अपने साथ टूथपेस्ट, सोप, मग इत्यादि लेकर चलना नही भूलते इसलिए वो भी ट्रेन में साफ़ सुथरे दिखाई देते हैं।

बेशक टी टी और पुलिस वालो की आमदनी में आजकल कुछ फर्क पड़ा हैं पर सहूलियत अब इन्हे भी हैं।

वक्त के बदलाव के साथ साथ कुछ नई जरूरते महसूस की जा रही हैं।

१. जैसे की प्रत्येक कम्पार्टमेंट में या कूप में एक मोबाइल चार्जर पॉइंट हो.
२.आरक्षित डिब्बो में बेद्डिंग की व्यवस्था
३. अकेली महिलाओ के लिए एक महिला कोच जिसमे टी टी और पुलिस बल भी महिला ही हो।
४। स्टेशन परिषर में ऐसी व्यवस्था की कोई शराब, सिगरेट डिब्बो तक न ले जा सके।
५.एक रेल लाइब्रेरी जिसमे मैगजीन, पुस्तके रिटर्न एबल बेसिस पर किराये पे उपलब्ध हो।
६.युवा छात्रों और ग्रुप के लिए एक सेपरेट बोगी जिसमे वो अगर शोरगुल भी करे और मस्ती में भी चले तो किसी बीमार, वृद्ध सहयात्री को परेशानी न हो।
७.कैटरिंग व्यवस्था को आर्गानैज करना , की आर्डर सुबह ही ले लिया जाए और टाइम पे सर्व हो। चाय काफ़ी, आमलेट ऐसे चिल्लाने की व्यवस्था बंद हो। एक वेटर हर आधे घंटे में डिब्बे में फेरी लगा जाए।
८.ट्रेन में हल्का संगीत बजता हो, पब्लिक एड्रेस सिस्टम से हलकी आवाज में ट्रेन की स्थिति की उद्घोषणा, किसी वजह से बीच में रुके तो कारण की घोषणा होनी चाहिए
९.रात के समय आरक्षित डिब्बो में कोई प्रवेश ना कर पाये चाहे वो केटरिंग वाला ही क्यूँ न हो । इस्सकी भी व्यवस्था होनी चाहिए।
१०.टी टी, डॉक्टर, गार्ड, पुलिस कहाँ हैं इसकी भी सूचना यात्रियो को होनी चाहिए।
११.डिब्बो में सेट-लाईट फ़ोन की व्यवस्था।

Sunday, 28 September, 2008

माँ

गंगा

इतने पापियो को
लगातार दोषमुक्त करना
लाखो टन पाप
निरंतर अपने में समेटना
इतना उदार ह्रदय
इतना उन्नत वक्ष
तुम ही कर सकती हो माँ

तुमसे ही सीखा हैं
भारतीय माताओ के अन्तः ने
संतानों के विछोह में
वक्ष स्थल भिगोना
और गौ माताओ ने
लरजते नेत्रों से , ताकते हुए बछडे को,
दूध पिलाने की आस में
ग्वाले को दूहने देना ।

वर्ल्ड ट्रेड सेंटर और पेंटागन पर आतंकी हमले के प्ररिप्रेक्ष्य में

चूमती थी आकाश
दर्प था उसको
अभेद्य था अजेय था
लाखो लाखो के सपने
जहाँ बनते थे , बुनते थे
वो सपनो के सहर का गुरुत्वाकर्षण
अब ना रहा।

ऐसे ही ढहते हैं सपने,
ऐसे ही नेस्तनाबूद हो रहा हैं सच
बुराईया जीत रही हैं
धर्म की हानि की सीमा क्या हैं प्रभु ?
कब आओगे?

दर्प तोड़ने का तो तुम्हे हक हैं
पर सपने तोड़ने का ?

अजनबी

सायो की तरह
शक चलता हैं मेरे साथ
ढूंढता रहता हूँ
हर अजनबी चेहरे में
बना रहता हैं एक अंदेशा
भयावह
जबसे पढ़ा हैं इश्तेहार
लावारिश वस्तु न छुए
किराये पर ना दे अजनबी को मकान

मेरी धर्मनिरपेक्षता

वैसे तो मैं कभी भी अपने को धर्मनिरपेक्षता के दायरों से मुक्त नही कर पाया , ना ही कट्टर हिंदू ब्राह्मण परिवार में जन्म लेने का ही मुझपर कोई असर रहा और न ही विश्व हिंदू परिषद् , शिवसेना, या bajrang दल के ब्रेन वाशिंग भाषणों से।

मुझ पर तब भी कोई असर नही हुआ जब हिंदू मुसलमानों की मौत का तांडव हुआ अयोध्या में। अफ्सोश हुआ था धर्मनिरपेक्षता की असफलता पर , अफसोश हुआ था मस्जिद के टूटने का, और निर्दोषों की मौत पर। पर मेरी धर्मनिरपेक्ष मानसिकता पर जरा सा भी असर नही हुआ । मुसलमानों और अन्य अल्पसंख्यक समुदाय के प्रति हमेशा ही मेरे मन में एक सॉफ्ट कार्नर रहा हैं। विश्व हिंदू परिषद् का जन जागरण अभियान मेरे उस सॉफ्ट कार्नर को कभी प्रभावित नही कर सके।

ना ही मेरे दादा दादी, पिता-माँ का संकीर्ण मनोभाव। ज़रीना के घर चाय ..... हे भगवान् , नही बेटा तुम्हे उनके घर का नही खाना चाहिए । उनके घर मँआश बनता हैं, तुम्हे अपने कुल पूर्वजो की मर्यादा , नीति नियमो का पालन करना चाहिए।

एक चाय की प्याली जहाँ मेरे कुल पूर्वजो की मर्यादा अतिकर्म कर रही थी, और मैं था जो ज़रीना के सामने विवाह प्रस्ताव रख रहा था।

ज़रीना के प्रेम, उसके परिवार से मिली आत्मीयता मेरे उस सॉफ्ट कार्नर को और भी सॉफ्ट करती जा रही थी। उस आत्मीयता और प्रेम को मैं धर्मनिरपेक्षता ही समझता रहा , हमारी महान भारतीय संस्कृति की संरख्छिका।

ज़रीना जब भगवान् कसम खाती थी तो लगता ही नही था की वो स्वाभाविक नही हैं । वो अपनी कापियों का प्रारम्भ "श्री" या "जय सरस्वती माँ " से किया करती थी । ये सब मुझे बहुत अच्छा लगता ।

पर विवाह प्रस्ताव ? अरे हां ... वो तो मैं भूल ही गया था। मैंने ज़रीना से कहा " मेरे लिए विवाह प्रस्ताव आ रहे हैं, माँ की तबियत ठीक नही रहती सो परिवार वालो को अब मैं नही रोक सकता, मुझे शादी करनी होगी, क्योँ न हम कोर्ट मैरिज़ कर ले ? आज कल कोर्ट मैरिज़ काफ़ी आसान हैं । हम दोनों को पता था की मेरे घर वाले इस सम्बन्ध को कभी स्वीकार नही करेगे।

इसके बाद ज़रीना ने जो कुछ मुझसे कहा , मेरी धर्मनिरपेक्षता पर हलाँकि उसका भी कोई प्रभाव नही पड़ा , लेकिन उसकी सरते अविश्वश्नीय , मैंने उसकी सरतो को उसकी मजबूरिया समझकर अपने आपको धर्मनिरपेक्षता की जंजीरों में और जकड लिया । वो चाहती थी की मैं इस्लाम कबूल कर लू , मुझे किसी धर्म से कोई ऐतराज नही था , ना उनके सिधान्तो से , ना उनकी पूजा पद्धति से । इस्लाम के कठोर उपासना के नियम मुझे अच्छे लगते थे और मेरा भी मानना यही था की भगवान् निराकार ही हैं, मुझे अपने हिन्दुओ के साधू पंडित और ३६ करोड़ देवी देवताओं का अस्तित्व, पूजा , कर्मकांड ढोंग लगते थे। पर मैं एक इश्वर पर भरोषा करता हूँ और वही विश्वाश हमेशा मेरा सहारा बनता हैं।

ज़रीना की दूसरी शर्त सुनकर मेरा रग रग खौलने लगा । जो ज़रीना मेरे प्रेम में ये कहती थी के मैं वेगेतारियन हूँ, उसकी दूसरी शर्त थी के मैं गो मांश का भक्षण करू । मेरी आँखों के सामने अपनी माँ का चेहरा आ गया । जो रोज गाय को रोटी देती थी। बचपन में जब मैं बीमार रहता था तो वो गाय को रोटी मेरे हाथों से दिलवाती और गौ माता के पैर चुने को कहती। मेरे घर में एक तस्वीर रखी हुयी जिसमे गोऊ माता के अंग अंग में इश्वर का निवास बताया गया था। बचपन में एक बार मैं बहुत ज्यादा बीमार हुआ तो डॉक्टर ने मांश मछली सेवन करने का सुझाव दिया था, पर पिताजी ने साफ़ मन कर दिया के चाहे ये मर जाए पर मैं अपने धर्म को भ्रष्ट नही होने दूँगा, अगर इसके सरीर को शक्ति चाहिए तो वो गाय के दूध से पूरी हो जायेगी। और रोज माँ मुझे सुबह साम गाय का दूध पिलाने लगी। ऐसी अमृतमयी माँ का मांश भक्षण ?? मैंने ज़रीना ko त्याग दिया ।

और ज़रीना ने भी मुझे बधाई दी " अगर तुम्हे जीवन देने वाली माँ के तुम नही हो सकते तो मेरे लिए मैं तुमसे क्या आशा रखती ? इन सब्दो ने मेरा साहस तो बढाया ही साथ ही साथ धर्मनिरपेक्षता के charदिवारी का और मजबूत कर गया।

जब भी कश्मीर में हिंदू मरते तो मैं सीमापार से आतंकवाद (हमारे नेताओ की भाषा) सोचकर चुप हो जाता, और अगर एक दो कश्मीरी मुसलमान हलक होते तो मानवाधिकार के दुहाई देता । मेरी धर्मनिरपेक्षता ने कुछ ऐसा रूप ले लिया था के कारगिल yuddh के पश्चात मेरी भावनाए पाकिस्तान विरोधी तो हो गई पर धर्मनिरपेक्षता अपनी जगह अडिग थी। मेरा धर्मनिरपेक्ष दृष्टिकोण अवधीत ही रहा आजतक।

११ तारीख का मैं ब्रह्मपुत्र मेल में असम जाने के लिए बैठा, मेरी टिकेट दो पार्ट में थी, डेल्ही से कानपूर और कानपूर से तिनसुकिया । कानपूर में जब मैं अपनी बर्थ चेंज की तभी एक मुस्लिम परिवार कोच में आया । एक अब्बा अम्मा दो खाला और दो बच्चे । ६ जनों का परिवार। उनकी एक टिकेट दूसरे कोच की थी और मेरे मेरी और मेरे भाई के बर्थ १२ और १३ उनके बर्थो की सीरीज़ को बिगाड़ रही थी। मेरे सॉफ्ट कार्नर ने उनकी साड़ी प्रॉब्लम साल्व कर दी, चूंकि ये परिवार मुझसे ज्यादा बातचीत नही कर रहा था इस्सलिये हिलना मिलना नही हुआ।

उन बच्चो के खाला काफ़ी हसीं थी, (माफ़ करे मेरी नजर अभी उसकी तरफ़ पलट गई थी, बगल वाली बर्थ में ही तो उनींदी हो रही हैं ) इस लड़की की मासूमियत, खामोसी, मुस्कराहट किसी का भी कलेजा टटोल सकती हैं। आवाज में कानपुरी लहजा और शऊर तो गजब का , मजाल हैं जो बदन का एक रेशा भी दिख जाए। मैं उस्सकी पवित्रता और मासूमियत का फेन होता जा रहा था।

उन बच्चो के अब्बा ने किसी भी भिखारी को अभी तक खली हाथ नही लौटाया था । चाहे वो भजन गाता या अल्लाह के नाम पर माँगता, गाने गाता या झाडू लगाकर मांगता, झूठ मूठ के गूंगे गुन्गियो, लंगडे लंग्डियो, अंधे आंधियो, सभी को एक ही रेट से दिया जा रहा था १ रूपया । उसका ये भेदभाव परे व्यवहार , धर्म भेद से परे भीक्स्चा दान मुझे धर्मनिरपेक्षता को रेखांकित करता सा लगा।

रेल गाड़ी रूकती सरकती, राजधानी एक्स्प्रेस्सो को पास देती आज कामख्या पहुची। कामख्या भारत का प्रसिद्ध तीर्थ हैं , यहाँ नीलांचल पहाड़ पर माँ कामख्या का प्राचीन मन्दिर स्थित हैं। यहाँ पंडे पंडितो की भरमार होती हैं।
और यही वह घटना घटी जिसका प्रभाव मेरी धर्मनिरपेक्षता पर पड़ा हैं।

कल अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के ट्विन टावर इस्लामी उग्रवाद के शिकार हो गए। इसका अमेरिका और बाकी अधिकाँश देशो पर जो प्रभाव पड़ा हैं , अमेरिकी अंतर्मन को जिस मात्रा के झटके की कल्पना हम कर सकते हैं उससे भी बहुत जोर का झटका लगा हैं आज मेरी धर्मनिरपेक्षता को।

कामख्या स्टेशन पहुचते ही एक पंडितजी कोच में प्रवेश कर गए। उनके एक हाथ में एक डोलची थी , जिसमे माता की फोटो सजाई हुयी थी। और वे सभी को तिलक करते जा रहे थे व प्रसाद दिए जा रहे थे। मैं ऊपर वाली बर्थ पे लेता कुछ लिखता जा रहा था। और इधर उधर निहार भी रहा था। पंडितजी ने ऊपर वाले बर्थ यानी मेरी तरफ़ देखा पर या तो उन्होंने मुझे nastik जाना होगा या ऊपर वाली बर्थ तक उनके हाथ नही पहुचने की वजह से उन्होंने मुझे प्रसाद से वंचित रखा। और मैं भी विशेष आग्रही नही था।

जब पंडित जी उन खाला अम्मी और बच्चो को प्रसाद अनुगृहित कर रहे थे(अब्बा सोये हुए थे) तो वे सभी प्रसाद लेने में हिचक रहे थे। लेकिन पंडितजी के दुबारा अनुरोध लीजिये लीजिये कहने पर वो मना नही कर सके।
अब वे किन्ग्कार्ताव्यविमूद्दा से नजर आने लगे। बड़ी खाला के तो जिस हाथ में प्रसाद था वो कापने लगा।मासूम hasina खिड़की के किनारे बैठी थी, उसने चतुराई दिखाई। उसने सबके हाथ से प्रसाद के दाने अपने हथेली में ले लिए। और उसका हाथ धीमे धीमे खिड़की की ओर बढ़ने लगा, मुझे अहसास हो गया वो क्या करने वाली हैं, मैं ऊपर वाली बर्थ से ही झुककर अपना हाथ ज की मुद्रा में नीचे बढाया, पर मेरा हाथ उसे नजर आने से पहले ही उसकी हथेली खुल गई थी।

और जब उसने मेरे बढे हुए हाथो को देखा तो उसकी पलके झुक गई, तब से अब तक वो मुझसे नजरे नही मिला पाई हैं। आज इस घटना का प्रभाव मेरे धर्मनिरपेक्षता पर पड़ा hain । आज शायद मैं धर्मनिरपेक्ष नही रहा।
अब शायद मुझे ईद की सेवेयियो में वो मीठास नही नही मिलेगी जो आज से पहले मिलती थी।