Monday, 29 September, 2008

माँ

माँ
तेरे बेटे तेरे घर का चिराग
और मैं लक्ष्मी पराये घर की ?
वो कमजोर, बीमार, या भ्रष्ट
या वन्श्द्रोही
वो सहारा तुम्हारा
और मैं चंचला तुम पर बोझ ?

माँ
तुझे पता मैं नदिया, दरिया
तुम्हे पता मैं सागर तुम सी
रत्न कोख में मेरे पलेगे
सृष्टि मात्री प्यारी बनूँगी।

थोड़ा सा स्नेह हो निर्झर
सावन जैसी मेह बरसती
फ़िर देखो मेरी भी माँ
कन्या को माताये तरसती॥

भारत उदय - 3

एक सोच थी,
एक सपना था,
हर हाथ में मोबाइल हो (धीरुभाई का सपना)
की हर कान में गूंजे
एक मधुर घनघनाहट
(क्षमा करे फ़ोन की रिंग को घनघनाहट कहा जाता था)

काश उनकी आँखों में
कुछ ऐसे सपने आए होते,
हर पेट में रोटी
हर हाथ में कलम
और हर होंठ पे मुस्कराहट

भारत उदय -2

एक एक जन का घर नही
स्कुलो में नही छात
फुटपाथ पे सोये बच्चे
पेटों में नही भात
आती नही हैं लाज
करते हैं
भारत उदय की बात

भारत उदय - 1

चंद नन्हे कदमो की दूरी पर
एक आकाश
लाखो जगमगाते सितारे
और हजारो रोशन चाँद
सड़क किनारे फुटपाथ पर
और छोटे शहरों के छतविहीन
प्लेटफार्म पर
मीठी सर्दियो में
लेम्प्पोस्ट की रौशनी से
गर्माहट तापते
नींद का आश्वादन करते
अधखुली आँख से
देख रहे हैं वो भी
"भारत उदय"

अतीत यौवन और आज

जन्मदिवस की अथाह खुशी
और नववर्ष में समाने का वो क्षणिक उत्साह
घने कोहरे के आगोश में ठिठुरती कलम
सोचने लगी अतीत यौवन और आज

धुल धूसरित बालपन
माँ का स्नेह, पिता की फटकार,
मार दुलार
वो खेल खिलौने
वो छोटा सा बांस बल्लियो का घर
और उसके कोने कोने
बेसुध नींद , वो प्यारे बिछौने ।

ईंट पत्थरों की कठोर दीवारों में
कसमसाई,
डनलप के गद्दे, मंहगे पलंग,
छटपटाती
करवट बदलती नींद
महकते कमरे में याद आती
माटी की सौंधी महक।

बचपन कैशोर्य और यौवन के
क्षीण सीमारेखाओ को पहचानता
आधी नींद के बाद जगा
मैं और मेरी कलम
सोचने लगी, अतीत यौवन और आज।

किशोर मैं , अनियंत्रित झोंका
पालविहिन नौका,
उतकृष्ट मानस का अभावमय अंत
उद्दंड मैं सामान्य विद्यार्थी॥

यौवन से सामना
अनुराग, प्रेम, और
असीम कल्पना
चाह क्षितिज स्पर्श की
मंजिले अनेक थी
राह एक भी नही
पथ एक तलाशता
चाँद को था चाहता
यूँही रात ढल गई
जिंदगी बदल गई।

ओश बिखरी पत्तिया
चमक गई किरण उषा
पक्षियो का कुजन गूंजा
एक नई भोर थी।

एक नई भोर थी,
सारे राह मोडती,
पत्थरों की राह थी
रोटियों की दौड़ थी।

गाँव शहर छोड़कर
आ गया महानगर
वायु दम घोटती
हर पल भाग दौड़ थी,
फुरशत के पल कहाँ?
आधी रात में जगा
मैं और मेरी कलम

बचपन कैशोर्य और यौवन
क्षीण सीमारेखाओ को पहचानता
आधी नींद के बाद जगा
मैं और मेरी कलम
सोचने लगी,
अतीत यौवन और आज।

भारतीय रेल का सफर १९७५-२००५

आज फ़िर एक बार स्लीपर क्लास में बैठा अपने विचारो को लेखबद्ध करने का प्रयत्न कर रहा हूँ। आज तक मैंने जितना भी लिखा हैं या लिखने का प्रयास किया हैं अधिकांश मैंने इन्ही ट्रेनों की भरी भीड़ और छुक छुक , धडाक धडाक तथा पंखो के संगीत की पर्शध्व्नी ही लिखा है । इन ट्रेनों में मेरे विचारो और चिंतन का उत्कर्ष होता हैं। इसके कई कारण हो सकते हैं । सबसे बड़ा कारण सायद यह हो की शहरो की भागदौड़ से दूर ट्रेनों में घंटो का सफर कुछ वक्त देता हैं विचार चिंतन के लिए, आत्ममंथन के लिए। एक कारण यह भी हो सकता हैं की सारे भारत की, भारत की समृद्ध संस्कृति, भारतीय जन जीवन , सभ्यता का सम्मलेन होती हैं ट्रेने ।

विचारो की गहन तंद्रा में जब मैं डूबा रहता हूँ तो अचानक लस्सी लस्सी, चाय चाय, बाबु, अल्लाह के नम पर, राम के नाम पर जैसे शब्द, वाक्य विचलित भी करते हैं, विचारो को वाधित करते हैं। और कभी कभी तो सहयात्री का मदिरापान , धुम्रपान मन में क्रोध उत्पन्न करता हैं ।

जब युवा छात्र छात्राओ की तोलिया ट्रेन में हो तो बहुत आनंद आता हैं। मन उनके साथ किशोर हो जाता हैं, बहकने लगता हैं। तभी किसी नवयौवना या नवयुवक का अनुरोध भरा स्वर " अंकल आप यह बर्थ ले लो " सोचने को मजबूर कर देता हैं की तुम एक दशक पहले के प्रीवियस जेनरेशन से हो। फ़िर मैं अभिभावक बन जाता हूँ। उनको कोई कष्ट न हो, कोई परेशां न करे, कोई उठाईगीरा उनका कोई सामन न चोर ले , मैं ध्यान रखने लगता हूँ।
आजकल अच्छा अंकल बनने लगा हूँ मैं । कुछ वर्ष पहले झुंझलाता था , कह देता था मुझे अंकल नही भइया बोलो।

आजकल ट्रेन का सफर काफ़ी आरामदायक हो गया हैं। सबसे बड़ा सुधार जिसे मैं विप्लवकारी संज्ञा दूँगा वो हैं लगभग सभी गाडियो में पेंट्री कार का प्रचलन होना और लम्बी दुरी के आरक्षित कोचों में अनाधिकार सामान्य यात्रा के यात्रियो का प्रवेश लगभग बंद होना। पहले तो भोर होते ही अनाधिकार प्रवेश शुरू हो जाता और रात में ऐसे यात्री इन्ही आरक्षित डिब्बो के फर्श पर तानकर सो जाया करते थे। जिससे नींद कोशो दूर रहती थी लेकिन अब स्थिति में बदलाव हैं। अब भी कुछ ऐसा माहौल होली दिवाली, आदि उत्सव के मौको पर देखने को मिलता हैं। उत्सव के समय विशेषकर जो ट्रेने पूर्वांचल लांघती जाती हैं उनमे ये परिस्थितिया सामान्य हैं।

१९८० के आसपास मैं असम की लोकल ट्रेनों में लगभग ५० किलोमीटर का सफर किया करता था, दो घंटे का सफर, स्टीम चालित इंजन, खिड़की के पास बैठने का मोह, और आँखों में घुसता कोयला। काले हो जाते थे कपड़े। वे बर्थ काठ की होती थी जिस पर धुल धुएं की अच्छी खासी परत होती थी। मुझे याद हैं पहाडी पर चदते वक्त उन इंजनो का दम निकलने लगता था। ओश भरी और बारिश से भीगी पटरियों में पहिये फिसलने लगते, डिब्बो को खीच नही पाते, तो आगे और पीछे दो इंजन लगाये जाते। कभी कभी घुमावदार पटरियो पर रेत भी डाली जाती , फ्रिक्शन पैदा करने के लिए। आजकल स्टीम इंजन प्रचलन में नही हैं, पर उन इंजनो की आवाज और उसपर रची बाल कविताये - बालगीत आज भी कितने ही बच्चो के मन में उत्सुकता पैदा करती होगी। " छुक-छुक करती आई रेल " अब रेल छुक छुक नही धडाक धडाक करती हैं ।

उस समय के डिब्बो में टिमटिमाते २० वाट के बल्ब होते थे और काले छोटे पंखे। उनमे से अधिकतर पंखो को चलायमान करने के लिए कलम या पतली डंडी से मैनुअली घुमाना पड़ता था । ये नुस्खा आजकल भी कभी कभी प्रयोग में आता हैं।

आज रात की ही तो बात हैं , एक युवा छात्रा अपनी सहेली से कह रही थी, "यार मुझे ये समझ नही आता की इतना बड़ा आइना यहाँ क्यूँ लगाया गया हैं"। " मैं बार बार अनचाहे ही ख़ुद को आईने में निहार लेती हूँ"। मैं कहने ही वाला था की ये आइना तुम्हारे सौन्दर्य को निहारने के लिए ही हैं, तभी अंकल वाला रोल याद आ गया। ट्रेनों में अकेली लड़किया भी सफर करने लगी हैं, इसका मतलब ये नही की पुरूष वर्ग भद्र हुआ हैं, यह तो उनकी बढती आत्मनिर्भरता , बेबकिपन, शिक्षा और आत्मरक्षा की भावना का फल हैं। वरना पुरुषवर्ग (सहयात्री) में से आधे से अधीक जो की अकेले सफर कर रहे होते हैं, उनकी लोलुप आँखे टटोलती रहती हैं उनका यौवन। उम्र तक का लिहाज नही होता । ५०-६० वर्षीय वृद्ध भी कुछ ऐसे होते हैं जो लड़कियों से किसी न किसी बहाने सटने, उनको स्पर्श करने को लालायित होते हैं।

शौचालयों की अवस्था कुछ वर्ष पहले अत्यधिक गन्दी होती थी। फ्लश का प्रयोग काफ़ी लोग नही करते थे और पानी की कमी के कारन भी शौचालय गंदे रहते थे। और ऐसी ऐसी चित्रकारी उफ , गन्दी पोर्नोग्राफी भी उसके सामने कुछ भी नही। इसमे कुछ सुधर यु आया की शौचालयों की दीवारों पे लेमिनेट्स सनमाईका चिपकाये जाने लगे , जिसपर कलम से लिखना और कुरेदना कम हो गया। आजकल बोगियो को भी सप्ताह में कम से कम एक बार दिसिंफेक्टेड किया जाने लगा हैं। बोगियो की आंतरिक साज सज्जा में काफ़ी बदलाव आया हैं। बरथे aaramdayak बनने लगी हैं। बर्थ जिन लोहे की पत्तियो और मोटी जंजीरों से लटके होते हैं उनपर रबड़ और रेक्सीन चढाई जाने लगी हैं । पहले ऐसा नही होता था , ठण्ड में ये धातु काफी ठंडे हो जाया करते थे, जिससे स्पर्श होने पर ठण्ड का करंट सा लगता था। अब बर्थ चौडी और कम्पार्टमेंट स्पेसियस हो गया हैं । चूंकि अब अनारक्षित यात्री प्रवेश नही करते तो सहयात्रियो की आपसी समझ से दिन में भी बर्थ लगाकर सो सकते हैं। पहले लोग पीने के पानी की केतली, बोतल, मयूर जग लेकर चला करते थे, और बोतलों को भरने के लिए स्टेशन का इन्तेर्जार होता था। स्टेशन के नल पे लम्बी कतरे हुआ करती थी। वो महिलाये जिनके पति या बच्चे पानी भरने के लिए कतार में लगते उनकी जान सूखती रहती की कही ट्रेन चल न पड़े, ट्रेन छुट न जाए। कभी कभी पानी भरने गया सहयात्री दो बोगी पीछे ही ट्रेन में चढ़ पाता। तब तक बेचारी वो महिला आधी हो जाती थी। अब ऐसे लोग कम ही दीखते हैं । ज्यादातर लोग एक दो लीटर की पानी की बोतल ट्रेन में ही खरीदना पसंद करते हैं।

आजकल सभी बड़े स्टेशन में डिब्बो पे पानी चढाने की व्यवस्था हैं। उससे शौचालय गंदे नही होते और यात्री भी आजकल ट्रेवल मिन्देद हो गए हैं। वो अपने साथ टूथपेस्ट, सोप, मग इत्यादि लेकर चलना नही भूलते इसलिए वो भी ट्रेन में साफ़ सुथरे दिखाई देते हैं।

बेशक टी टी और पुलिस वालो की आमदनी में आजकल कुछ फर्क पड़ा हैं पर सहूलियत अब इन्हे भी हैं।

वक्त के बदलाव के साथ साथ कुछ नई जरूरते महसूस की जा रही हैं।

१. जैसे की प्रत्येक कम्पार्टमेंट में या कूप में एक मोबाइल चार्जर पॉइंट हो.
२.आरक्षित डिब्बो में बेद्डिंग की व्यवस्था
३. अकेली महिलाओ के लिए एक महिला कोच जिसमे टी टी और पुलिस बल भी महिला ही हो।
४। स्टेशन परिषर में ऐसी व्यवस्था की कोई शराब, सिगरेट डिब्बो तक न ले जा सके।
५.एक रेल लाइब्रेरी जिसमे मैगजीन, पुस्तके रिटर्न एबल बेसिस पर किराये पे उपलब्ध हो।
६.युवा छात्रों और ग्रुप के लिए एक सेपरेट बोगी जिसमे वो अगर शोरगुल भी करे और मस्ती में भी चले तो किसी बीमार, वृद्ध सहयात्री को परेशानी न हो।
७.कैटरिंग व्यवस्था को आर्गानैज करना , की आर्डर सुबह ही ले लिया जाए और टाइम पे सर्व हो। चाय काफ़ी, आमलेट ऐसे चिल्लाने की व्यवस्था बंद हो। एक वेटर हर आधे घंटे में डिब्बे में फेरी लगा जाए।
८.ट्रेन में हल्का संगीत बजता हो, पब्लिक एड्रेस सिस्टम से हलकी आवाज में ट्रेन की स्थिति की उद्घोषणा, किसी वजह से बीच में रुके तो कारण की घोषणा होनी चाहिए
९.रात के समय आरक्षित डिब्बो में कोई प्रवेश ना कर पाये चाहे वो केटरिंग वाला ही क्यूँ न हो । इस्सकी भी व्यवस्था होनी चाहिए।
१०.टी टी, डॉक्टर, गार्ड, पुलिस कहाँ हैं इसकी भी सूचना यात्रियो को होनी चाहिए।
११.डिब्बो में सेट-लाईट फ़ोन की व्यवस्था।