Wednesday 15 October 2008

मोली की कहानी

मोली, कितना प्यारा नाम हैं ना ? नन्ही ३ साल की हैं अभी। नाम जैसा प्यारा हैं उतनी ही प्यारी गुडिया सी हैं मोली।
अपने खेल खिलौने से बहुत प्यार हैं उसे। उसका एक सॉफ्ट टेड्डी हैं, जिसे वो बाबु बुलाती हैं, वो बाबु से लिपटकर सोती थी। उसे एक पल भी आंखों से बाबु दूर होता तो वो बेचैन हो जाती थी। रो रोकर बुरा हाल हो जाता था। पर उसके
मम्मी पापा गंदे हैं, मैं नही मोली कहती हैं। मम्मी पापा आपस में लड़ते रहते हैं। उनकी लड़ाई के चक्कर में मोली का बाबु दिल्ली में छूट गया, और पापा भी दिल्ली में रह गए। और मम्मी आ गई अपने मम्मी पापा के पास। पर मोली क्या करे, बाबु से दूर, पापा से दूर?

चाचू की शादी में मोलू दादी के घर आई। पहली बार। हाँ जन्म के तुंरत बाद से hi वो दादी के घर से माँ के घर, माँ के घर से नानी के घर, नानी के घर से अपने पापा के दिल्ली वाले घर, फ़िर मामा के घर, और अब फ़िर माँ के घर... घूम ही रही हैं। लेकिन मोलू से किसी ने नही पूछा की " मोलू कहाँ जाना हैं?" कहाँ रहना हैं ? हाँ मोलू पहली बार दादी के घर आई, जैसे रौनक आ गई हो घर में। नई चाची की उतनी पूछ नही थी, जितनी मोली की थी। पापा भी आए , दादी-दादा, चाची-चाचा, बुआ, और पापा-मम्मी सभी मोली को कितना प्यार करते हैं। मोली बहुत खुश हैं यहाँ सबके साथ, बस एक गम हैं बाबु नही आया उसके चाचू की शादी में। फ़िर भी मोली इतने में भी बहुत खुश थी। सबका साथ जो था। पर फ़िर मम्मी ले गई उसे नानी के घर। मोली समझ कहाँ पाती थी की मम्मी पापा लड़ते क्यूँ हैं, वो छोटी सी जान कैसे समझती जब वो दोनों ही नही समझ पा रहे थे। और हम ही कहाँ समझ गए? बहुत दिमाग पर जोर डालते तो इतना समझ आता की दोनों के विचार नही मिलते, आपस में समझ नही हैं, टेम्परामेंट नही मिल रहे। लेकिन इन सबमे मोली की क्या गलती ? "मोली की कहानी " काफ़ी लम्बी होती जा रही हैं, इसलिए मैंने इसके लिए दूसरा ब्लॉग आरम्भ कर दिया हैं मोलिकिकहानी.ब्लागस्पाट.कॉम

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