Monday, 2 May, 2011

तड़प रही कराहती माँ भारती पुकारती

माँ भारती पुकारती युवा तुम बढे चलो

इस तरफ न उस तरफ बस एक तरफ चले चलो
तड़प रही कराहती माँ भारती पुकारती
दंश दे रहे हैं दानव मेरी तुम रक्षा करो
माँ भारती पुकारती युवा तुम बढे चलो

रक्त की हर एक बूँद , कर्ज माँ के दूध का
कर्ज ये उतार दे शीश अपना वार दे
माँ भारती पुकारती युवा तुम बढे चलो
इस तरफ न उस तरफ बस एक तरफ चले चलो

वो गोल घर हैं बना अड्डा जालिमो लुटेरो का
धन पशु डकार रहे हमारी धन सम्पदा
आर हो या पार हो तू देश को उबार दे
माँ भारती पुकारती तू शीश अपना वार दे

पाट दे तू खायी अमीर और गरीबो की
चंगुलो से मुक्त कर खेतो को खलिहानों को
माँ भारती पुकारती युवा तुम बढे चलो
इस तरफ न उस तरफ बस एक तरफ चले चलो

शांति से जनपथ पे आकर अपना हक तू मांग ले
आनाकानी हो जो कोई, खुद को भगत सिंह जान ले
भ्रष्टाचारी देशद्रोही का करना हैं विनाश तो
शांति को भी साथ ले और क्रांति को भी साथ ले
साथ साथ बढे चलो , माँ भारती पुकारती
तड़प रही कराहती माँ भारती पुकारती

2 comments:

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

मां की आवाज सुनना सिखाया किसे है...

Rajesh Sharma said...

माननीय भारतीय नागरिक
आपका मेरे पोस्ट तक पहुचने के लिए धन्यवाद / लेकिन समझने में असमर्थ हूँ की आपको ये रचना अच्छी लगी या नहीं / "मां की आवाज सुनना सिखाया किसे है..." ये अगर आपका प्रश्न हैं मुझसे तो बताना चाहूगा की ये रचना किसी को सिखाने के उद्देश्य से नहीं बल्कि अपने मन में उठ रही सोच हैं / आशा करता हूँ की मेरी अपनी अंतरात्मा की आवाज कुछ और लोगो तक भी पहुचे / आपका सहृदय आभार