Monday 29 September 2008

माँ

माँ
तेरे बेटे तेरे घर का चिराग
और मैं लक्ष्मी पराये घर की ?
वो कमजोर, बीमार, या भ्रष्ट
या वन्श्द्रोही
वो सहारा तुम्हारा
और मैं चंचला तुम पर बोझ ?

माँ
तुझे पता मैं नदिया, दरिया
तुम्हे पता मैं सागर तुम सी
रत्न कोख में मेरे पलेगे
सृष्टि मात्री प्यारी बनूँगी।

थोड़ा सा स्नेह हो निर्झर
सावन जैसी मेह बरसती
फ़िर देखो मेरी भी माँ
कन्या को माताये तरसती॥

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