Sunday 28 September 2008

वर्ल्ड ट्रेड सेंटर और पेंटागन पर आतंकी हमले के प्ररिप्रेक्ष्य में

चूमती थी आकाश
दर्प था उसको
अभेद्य था अजेय था
लाखो लाखो के सपने
जहाँ बनते थे , बुनते थे
वो सपनो के सहर का गुरुत्वाकर्षण
अब ना रहा।

ऐसे ही ढहते हैं सपने,
ऐसे ही नेस्तनाबूद हो रहा हैं सच
बुराईया जीत रही हैं
धर्म की हानि की सीमा क्या हैं प्रभु ?
कब आओगे?

दर्प तोड़ने का तो तुम्हे हक हैं
पर सपने तोड़ने का ?

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