Wednesday, 1 October, 2008

ये फफोले

तुम्हे अहसास तो हुआ होगा
नपुंसकता का
जब तुम्हारी आँखे बरसी होगी
क्षत विक्षत लिंग कटे शहीद को देखकर
जब कांपते हांथो से
तुमने छुई होगी
वो ठंडी देह
बर्बरता का अवशेष ।

तुमने धिक्कारा होगा
अपने आप को
जब तुम्हारा ह्रदय जल रहा था
अमिट पीड़ा दे रहे थे
वो फफोले
नमक मिर्च भरे घाव
देखा तुम्हारी
तुच्छ राजनीति का परिणाम
तुष्टिकरण की नीतियों का अवशेष
तब तुम्हे याद आए होगे
वो असमिया छात्र
जो चेता रहे थे
ये आग
चिल्ला रहे थे "विदेशी भागो"
ओट रहे थे गोलिया छाती पर

और मैं ?
मैं तो पुरुषत्व विहीन हूँ
जो सोचता रहता हूँ
ऐसे वक्त में भी तुम्हारा अहसास..

No comments: